Saturday, 20 June 2015

 
काश साहब साहित्यकार होते-
हिन्दी के साहित्यकार अब गाँवों से विमुख हो चुके हैं. दिल्ली में रहने वाले प्रोफ़ेसर एक लक्खा से ऊपर हैं.दिल्लीनुमा अध्यापक साहित्यकारों वाला पुराना गाँव पचास साल पहले वाला है। सवाल यह है कि देखि दुपहरी जेठ की छाहौं चाहत छाँह, लिखने वाले कितने साहित्यकार अब हैं. दिल्ली का ए सी छोड़ कर कौन गाँवों में जहमत उठाने जाए बाबू।  इसीलिये कहता हूँ कि अब रचनाकारों में ईमानदारी की कमी और अनुभव सम्मत ज्ञान का अभाव है।  गाँव कितनी तेजी से बदल रहे हैं।  कस्बे का क्या हाल है।  गाँवों के किसान मजदूर कितने  तबाह है। अरहर की दाल उसके लिए सपना है।  न पेड़ हैं और खेत।  सब विलुप्त।  पास के कस्बे वाला जमीन का दलाल गाँवों के किसानों को उनके जमीन से बेदखल कर रहा है।  बहुत सी बातें दिल्ली के साहब साहित्यकार लोग टेलीविजन पर देख और सुनकर लिखते हैं.

Friday, 19 June 2015

 साहित्य में जुगाड़-
हिन्दी आलोचना का दायरा महज विश्वविद्यालयों तक ही है। एक विश्वविद्यालय का शिक्षक कवि तो दूसरे का आलोचक,दूसरे  का कहानीकार तो तीसरे का आलोचक। उपन्यास के क्षेत्र में सेवानिवृत्त डाक्टर साहब की पौ बारह।  संस्मरण में अस्सी पार महारथी।  मतलब वह भी बूढ़ा हो चुका।  असल में हिन्दी की दुर्गति यही है।  एकाध बाहरी हैं तो वह भी आलोचक शिक्षक को पटाये हैं। 

Sunday, 7 June 2015

राम का था ही नहीं-
वह राम का न था
रावण उसका आदर्श था
सोने की लंका का अधिपति
विभीषण से उसे कभी डर नहीं लगा
राजपाट सब अपना
मुरौव्वत उसमें न थी
वह राजा
जी हाँ राजा सोने की चिड़िया का
जय श्री राम
आपके नाम पर हो गया काम!