Thursday, 27 February 2014

यह नेताओं की सियासी फ़ितरत  है-
विनय कांत मिश्र। भारतीय राजनीति इन  दिनों उल्टी टंगी है।  सत्ता सुख हासिल  कर रहे नेताओं की दलीय प्रतिबद्धता का कोई मतलब नहीं है। संसद में सांसद के रूप में प्रवेश की मनः स्थिति ने नेताओं को दोगली राजनीति का शिकार बनाया है।  एक दर्जन से अधिक कांग्रेसी नेता इन दिनों मोदी के तलवे चाटने के लिए बेताब है। 2 मार्च को लखनऊ की रैली में सियासी बेशर्मी की हदें पार होंगी।  कई नेता पाला बदल कर इस पार से उस पार जाएंगे।  
      किसी जमाने में कांग्रेस 

Saturday, 1 February 2014

वक्त ने किया क्या हंसी सितम-
कोलकाता में सुभाष बाबू के खिलाफ पर्चे क्यों वितरित करवाये गए थे? क्या गांधी जी न होते तो भारत आज़ाद न होता! वाया कांग्रेस सुभाष बाबू स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नहीं हो  सकते थे! क्या सुभाष बाबू की चलती तो पाकिस्तान बनता! भगत सिंह की फांसी की सजा माफ़ नहीं करवाई जा सकती थी ! गांधी बाबा ने पाकिस्तान बनने के साथ ही भारत से उसे हर्जाना क्यों दिलवाया! गांधी जी सुभाष बाबू को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में क्यों नहीं बर्दाश्त कर सके? सवाल बहुतेरे हैं ? असल में गांधी जी के साथ  भारतीय  स्वतन्त्रता आंदोलन का ढेर सारा  मिथक जोड़ दिया गया! इन मिथकों के साथ ही अन्य स्वतन्त्रता सेनानियों का अवदान विस्मृत कर दिया गया!